कोरबा/ पसान // कोरबा जिले में अवैध रेत खनन और भंडारण के खिलाफ कार्रवाई के सरकारी दावों की पोल पेंड्रा-गेवरा रेल लाइन परियोजना खोलती नजर आ रही है।
सूत्र वन क्षेत्र से उत्खनन के आरोप, वन विभाग की चुप्पी पर सवाल
पेंड्रा-गेवरा रेल लाइन परियोजना के निर्माण कार्य में अवैध रूप से खनन की गई रेत के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्राम पंचायत अड़सरा के आश्रित ग्राम खरिहा टिकरा स्थित मिक्सिंग प्लांट परिसर में सैकड़ों हाईवा रेत डंप होने की जानकारी सामने आने के बावजूद खनिज विभाग की चुप्पी कई तरह के संदेह पैदा कर रही है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बिना वैध दस्तावेजों और रॉयल्टी के भारी मात्रा में रेत यहां पहुंचाई जा रही है, लेकिन जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है।
हजारों ट्रिप रेत खप गई, लेकिन कार्रवाई नहीं! अब वन विभाग भी सवालों के घेरे में

छत्तीसगढ़ रेल विकास निगम द्वारा ईस्ट-वेस्ट रेल कॉरिडोर परियोजना के तहत पेंड्रा रोड से गेवरारोड तक लगभग 135 किलोमीटर लंबी रेल लाइन का निर्माण कराया जा रहा है। निर्माण स्थलों, रेलवे ट्रैक के किनारे और मिक्सिंग प्लांट परिसरों में बड़ी मात्रा में रेत का भंडारण देखा जा सकता है। सवाल यह है कि आखिर इतनी बड़ी मात्रा में रेत कहां से आई? यदि रेत वैध है तो उसके ट्रांजिट पास, रॉयल्टी भुगतान और भंडारण की अनुमति सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
वन विभाग और खनिज विभाग पर उठे गंभीर सवाल
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि आसपास की नदी-नालियों और वन क्षेत्रों से रेत का उत्खनन कर निर्माण कार्य में उपयोग किया गया है। क्षेत्र में किसी वैध रेत खदान या अधिकृत भंडारण स्थल की जानकारी नहीं होने के बावजूद रेत के विशाल भंडार मौजूद हैं। इसके बाद भी जिम्मेदार विभागों की चुप्पी लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि कोई गरीब व्यक्ति अपने घर, प्रधानमंत्री आवास या छोटे निर्माण कार्य के लिए एक-दो ट्रैक्टर रेत लाता है तो खनिज विभाग तत्काल कार्रवाई कर जुर्माना वसूल लेता है। वाहन जब्त कर लिए जाते हैं और प्रकरण दर्ज कर दिए जाते हैं। लेकिन करोड़ों रुपये की रेलवे परियोजना में कथित तौर पर हजारों ट्रिप रेत उपयोग होने के बावजूद विभाग की नजर नहीं पड़ रही। इससे विभाग के दोहरे रवैये पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
रेत के पहाड़ और विभाग मौन, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल?
जानकारों का कहना है कि यदि निर्माण कार्य में उपयोग की जा रही रेत के दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच हो जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकता हैं
हैं। आखिर किसके संरक्षण में यह पूरा खेल चल रहा है? क्या संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदेश के अन्य जिलों में रेलवे परियोजनाओं और निर्माण कार्यों में अवैध रेत भंडारण मिलने पर खनिज विभाग नोटिस जारी कर कार्रवाई करता है, तो पेंड्रा-गेवरा रेल लाइन परियोजना में ऐसे आरोपों के बावजूद जांच क्यों नहीं हो रही? क्या बड़े ठेकेदारों और प्रभावशाली एजेंसियों के लिए नियम अलग हैं और आम जनता के लिए अलग?
स्थानीय नागरिकों ने जिला प्रशासन, खनिज विभाग और राज्य सरकार से पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की है। साथ ही निर्माण कार्य में उपयोग की गई रेत के स्रोत, रॉयल्टी भुगतान, परिवहन अनुमति और भंडारण संबंधी सभी दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग भी उठाई है।
अब जनता पूछ रही है—यदि एक ट्रैक्टर रेत पर गरीब किसान और ग्रामीण अपराधी बना दिए जाते हैं, तो रेलवे परियोजना में कथित रूप से खपाई गई हजारों ट्रिप रेत की जवाबदेही कौन तय करेगा? और आखिर खनिज विभाग की खामोशी किसे बचा रही है?










