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मनरेगा पशु शेड मूल्यांकन में रिश्वत का आरोप: वीडियो के बावजूद क्लीन चिट पर उठे सवाल

 

गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही (GPM)। जनपद पंचायत गौरेला में महात्मा गांधी नरेगा के तहत पशु शेड के मूल्यांकन के बदले कथित रिश्वत मांगने का मामला अब सिर्फ तकनीकी सहायक तरुण ताम्रकार तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

 

शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत किए गए लेन-देन के कथित लाइव वीडियो, पीड़ित परिवार के लिखित बयान और 4 हजार रुपये दिए जाने के दावे के बावजूद जांच समिति द्वारा तकनीकी सहायक को दोषमुक्त किए जाने की अनुशंसा ने पूरे मामले को सवालों के घेरे में ला दिया है। जांच समिति में परसराम पन्द्रे, सुरेंद्र कुमार कुर्रे और कीर्ति कुमार कुसरो की भूमिका को लेकर अब ग्रामीण पूछ रहे हैं कि आखिर उपलब्ध साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया या फिर मामले को किसी तरह रफा-दफा करने की कोशिश हुई?

*रिश्वत के आरोप से शुरू हुआ मामला, सामने आया वीडियो*

पीड़ित हेतराम राठौर और उनके पिता धरमलाल राठौर ने आरोप लगाया कि पशु शेड की फाइल आगे बढ़ाने और मूल्यांकन के लिए तकनीकी सहायक द्वारा कथित तौर पर 5 हजार रुपये की मांग की गई थी। शिकायतकर्ता के अनुसार आर्थिक मजबूरी के बीच उन्होंने महतारी वंदन योजना से मिली राशि बैंक से निकालकर जनपद पंचायत कार्यालय की छत पर कथित तौर पर 4 हजार रुपये दिए, जिसका लगभग 1 मिनट 11 सेकंड का वीडियो भी शिकायत के साथ प्रस्तुत किया गया। पीड़ित परिवार ने अपने बयान में भी इस पूरे घटनाक्रम का उल्लेख किया, लेकिन जांच के दौरान वीडियो की प्रामाणिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए गए।

*वीडियो एडिटेड है तो FSL जांच से परहेज क्यों?*

सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि वीडियो को एडिटेड या संदिग्ध माना गया, तो उसकी सत्यता की जांच के लिए उसे तत्काल फॉरेंसिक साइंस लैब यानी FSL क्यों नहीं भेजा गया? वीडियो असली है या उसमें छेड़छाड़ हुई है, इसका तकनीकी परीक्षण कराया जा सकता था, लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार ऐसा करने के बजाय जांच रिपोर्ट में यह शर्त रखी गई कि यदि शिकायतकर्ता अपनी मांग पर कायम रहता है, तभी वीडियो को FSL भेजा जाएगा। यही बिंदु अब जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है।

*रिश्वत के आरोप के बीच ‘चार महीने पुरानी उधारी’ की एंट्री*

मामले को कमजोर करने के लिए शिकायतकर्ता के वीडियो के समानांतर कथित तौर पर एक नई कहानी सामने लाई गई। उप-सरपंच के बयान के आधार पर करीब चार महीने पुरानी 10 हजार रुपये की निजी उधारी को सामने रखा गया और वीडियो में दिखाई देने वाले कथित लेन-देन को उसी उधारी से जोड़ने का प्रयास किया गया। लेकिन सवाल यह है कि इस कथित निजी उधारी का ठोस दस्तावेजी प्रमाण क्या है और क्या उसका वीडियो में दिखाई देने वाले लेन-देन से वास्तविक संबंध साबित हुआ? यदि दोनों घटनाएं अलग थीं तो उन्हें जोड़ने का आधार क्या था?

*क्लीन चिट के साथ सिर्फ चेतावनी—कार्रवाई या खानापूर्ति?*

गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच जांच समिति द्वारा तकनीकी सहायक को दोषमुक्त किए जाने की अनुशंसा ने ग्रामीणों को सबसे ज्यादा हैरान किया है। कार्रवाई के नाम पर भविष्य में निजी उधारी का लेन-देन नहीं करने की चेतावनी दिए जाने की बात सामने आ रही है। ग्रामीणों का सवाल है कि अगर पूरा मामला निजी उधारी का था तो सरकारी योजना से जुड़े कार्य में रिश्वत मांगने की शिकायत और वीडियो की पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए तकनीकी जांच क्यों नहीं कराई गई? और यदि आरोप गलत थे, तो शिकायतकर्ता के आरोपों को ठोस साक्ष्यों के साथ खारिज क्यों नहीं किया गया?

*तीन अधिकारियों की जांच, फिर भी सवालों का जवाब अधूरा*

जांच समिति में परसराम पन्द्रे, सुरेंद्र कुमार कुर्रे और कीर्ति कुमार कुसरो के नाम सामने आने के बाद अब ग्रामीण यह जानना चाहते हैं कि जांच के दौरान कौन-कौन से दस्तावेज देखे गए, किन लोगों के बयान लिए गए, वीडियो की तकनीकी जांच क्यों नहीं हुई और कथित 10 हजार रुपये की उधारी को प्रमाणित करने के लिए क्या दस्तावेज जांच में शामिल किए गए। सवाल यह भी है कि क्या शिकायतकर्ता को अपने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की स्वतंत्र जांच कराने का पूरा अवसर दिया गया?

*ग्रामीणों का आरोप—नियमों की आड़ में भ्रष्टाचार पर पर्दा?*

ग्रामीणों और मनरेगा हितग्राहियों में इस मामले को लेकर असंतोष की बात सामने आ रही है। उनका कहना है कि गरीब हितग्राही सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए अधिकारियों-कर्मचारियों के चक्कर काटता है और यदि किसी स्तर पर पैसे मांगने की शिकायत सामने आती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होना जरूरी है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि उपलब्ध साक्ष्यों को तकनीकी रूप से परखा ही नहीं जाएगा और बयानों के आधार पर मामले को दूसरी दिशा में मोड़ दिया जाएगा, तो भ्रष्टाचार की शिकायतों पर कार्रवाई का भरोसा कैसे कायम रहेगा?

*अब असली सवाल—FSL जांच होगी या ‘क्लीन चिट’ ही अंतिम सच?*

इस पूरे मामले में अब गेंद उच्च प्रशासन के पाले में है। यदि वीडियो फर्जी या एडिटेड है तो FSL जांच से यह स्पष्ट हो सकता है। यदि वीडियो वास्तविक है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। वहीं यदि 4 हजार रुपये का लेन-देन वास्तव में किसी पुरानी निजी उधारी की वापसी था, तो उसके ठोस प्रमाण भी सामने आने चाहिए। लेकिन इन सवालों का तकनीकी और दस्तावेजी जवाब दिए बिना किसी कर्मचारी को क्लीन चिट देने से जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब सवाल तरुण ताम्रकार से ज्यादा उस जांच प्रक्रिया पर है, जिसने कथित रिश्वत के वीडियो और पीड़ित के बयानों के बावजूद मामले का निष्कर्ष कर्मचारी के पक्ष में पहुंचा दिया। क्या यह महज जांच की चूक है या फिर किसी को बचाने की कोशिश? इसका जवाब निष्पक्ष FSL जांच और उच्चस्तरीय जांच से ही सामने आ सकता है।

नोट: खबर में वर्णित रिश्वतखोरी के आरोप शिकायतकर्ता के दावों और उपलब्ध विवरणों पर आधारित हैं। आरोपों की अंतिम पुष्टि सक्षम जांच/न्यायिक प्रक्रिया से होगी। संबंधित कर्मचारी एवं जांच समिति के अधिकारियों का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

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Author: CG City News

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