कोरबा/पसान। लगभग 70 वर्ष पुराने शासकीय सांस्कृतिक रंगमंच को जेसीबी से तोड़े जाने का मामला अब केवल स्थानीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और शासकीय संपत्ति की सुरक्षा का बड़ा सवाल बन चुका है।
इस मामले में तहसीलदार पसान की जांच रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि रंगमंच को बिना सक्षम अनुमति के तोड़ा गया। साथ ही उपलब्ध सीमांकन अभिलेखों के अनुसार रंगमंच का केवल आंशिक हिस्सा ही संबंधित निजी भूमि से जुड़ा बताया गया है। इसके बावजूद अब तक किसी कठोर कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है।

70 साल पुराना शासकीय रंगमंच जमींदोज: रसूख के आगे नतमस्तक हुआ तंत्र?
एक तरफ सरकार सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी तरफ भू-माफिया और रसूखदारों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे दशकों पुरानी सरकारी धरोहरों पर भी बुलडोजर चलाने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। ऐसा ही एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है, जहां 70 साल पुराने शासकीय स्कूल के रंगमंच (स्टेज) को अवैध रूप से ध्वस्त कर दिया गया।
बिना अनुमति के ढहाया गया इतिहास
इस रंगमंच से स्कूल के बच्चों की न जाने कितनी यादें और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां जुड़ी थीं। मामले की गंभीरता को देखते हुए जब प्रशासनिक स्तर पर जांच की गई, तो इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि ध्वस्तीकरण पूरी तरह से बिना अनुमति (अवैध) किया गया था।
जांच में पुष्टि, फिर भी कार्रवाई पर ‘ब्रेक’ क्यों?
जांच रिपोर्ट में अवैध ध्वस्तीकरण की बात साबित होने के बावजूद, अब तक दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। सूत्रों की मानें तो इस पूरे खेल के पीछे एक बड़े रसूखदार नीरज जैन का हाथ है, जिसके दबाव में स्थानीय प्रशासन कार्रवाई करने से कतरा रहा है।
बड़ा सवाल: > क्या इस ऐतिहासिक और शासकीय संपत्ति को उसका हक मिलेगा? या फिर हर बार की तरह इस बार भी रसूखदार के रसूख के आगे हमारा पूरा प्रशासनिक तंत्र नतमस्तक हो जाएगा?
जनता पूछ रही है सवाल:
- जब जांच में अवैध ध्वस्तीकरण की पुष्टि हो चुकी है, तो एफआईआर (FIR) दर्ज करने में देरी क्यों?
- क्या सरकारी जमीन और बच्चों के रंगमंच को उजाड़ने वाले रसूखदार कानून से भी ऊपर हैं?
- स्थानीय प्रशासन इस मामले में मौन क्यों साधे हुए है?
बढ़ते जा रहे सवाल
क्षेत्र के लोगों के बीच चर्चा है कि यदि किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा शासकीय भूमि पर अतिक्रमण किया जाता है तो प्रशासन तत्काल कार्रवाई करता है। ऐसे में जब एक शासकीय रंगमंच को नुकसान पहुंचाने का मामला जांच के दायरे में आ चुका है, तो क्या इस मामले में भी कानून समान रूप से लागू होगा?
राजस्व विभाग पहले ही कई मंचों पर शासकीय भूमि पर कब्जे के खिलाफ सख्त रुख की बात कह चुका है। ऐसे में नागरिक पूछ रहे हैं कि क्या यह सख्ती इस मामले में भी दिखाई देगी।

प्रशासन के सामने बड़ी परीक्षा
अब निगाहें कलेक्टर कोरबा, एसडीएम पोड़ी- उपरोड़ा और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों पर हैं। यदि जांच रिपोर्ट के आधार पर आगे वैधानिक कार्रवाई होती है, तो यह संदेश जाएगा कि कानून सभी के लिए समान है। वहीं यदि कार्रवाई लंबित रहती है, तो स्थानीय स्तर पर सवाल और तेज हो सकते हैं।
जनता का सवाल
क्या 70 साल पुरानी शासकीय धरोहर को न्याय मिलेगा?
क्या शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले में जिम्मेदारी तय होगी?
या फिर यह मामला भी लंबी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
इन सवालों का जवाब अब प्रशासन की आगामी कार्रवाई तय करेगी।
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