बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि, छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 170-बी के तहत कार्रवाई करते समय यह पूरी तरह जांचना जरूरी है कि किसी गैर-आदिवासी ने आदिवासी की जमीन पर कब्जा कैसे किया और उसके कब्जे को कानूनी मान्यता किस आधार पर मिली।

राजस्व मंडल कब्जे की कानूनी मान्यता और टाइटल के स्रोत की जांच करें, स्पीकिंग आर्डर जारी करने का निर्देश
कोर्ट ने कहा कि केवल वर्ष 1959 से पहले की राजस्व प्रविष्टि या पंजीकृत हस्तांतरण दस्तावेज नहीं मिलने के आधार पर मामले का फैसला नहीं किया जा सकता। जांच अधूरी पाए जाने पर मामले को सक्षम प्राधिकारी के पास नए सिरे से निर्णय के लिए भेजा जाना चाहिए। मामला सरगुजा जिले के सीतापुर क्षेत्र के ग्राम बटौली स्थित खसरा नंबर 5 की 3.96 एकड़ कृषि भूमि से जुड़ा है। विमल व अन्य ने धारा 170-बी के तहत जमीन वापस दिलाने की मांग करते हुए दावा किया था कि भूमि उनके पूर्वज स्वर्गीय पंद्रा ओरांव के नाम वर्ष 1939 के सरगुजा स्टेट सेटलमेंट रिकॉर्ड में दर्ज थी। आरोप था कि वर्ष 1975 के आसपास पंद्रा ओरांव के वंशज गांव छोड़कर चले गए।
चारों आदेश निरस्त
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद कहा कि, धारा 170-बी के तहत विवाद का निपटारा पूरी जांच के बिना नहीं किया जा सकता। जांच में वर्ष 1954-55 की मूल सेटलमेंट कार्यवाही, 8 अप्रैल 1956 के कथित सेटलमेंट आदेश, अधिकार अभिलेख की कानूनी स्थिति, याचिकाकर्ताओं के पूर्वजों के नाम दर्ज होने की परिस्थितियों और उनके कब्जे की वैधता की जांच जरूरी है। साथ ही आदिवासी परिवार द्वारा जमीन छोड़ने और धोखाधड़ी से जमीन हड़पने के आरोपों सहित सभी कानूनी पहलुओं पर भी विचार करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने राजस्व मंडल बिलासपुर के 3 मार्च 2022, कमिश्नर सरगुजा के 9 जुलाई 2018, कलेक्टर सरगुजा के 8 मार्च 2018 और एसडीओ सीतापुर के 10 दिसंबर 2014 के आदेशों को निरस्त कर दिया। मामले को राजस्व मंडल को वापस भेजते हुए हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर देने तथा आवश्यक मूल राजस्व रिकॉर्ड मंगाकर क्रॉस-एग्जामिनेशन सहित पूरी जांच के बाद तर्कपूर्ण और बोलता आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।
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