ह मारा समाज बड़ा अजब-गजब है। जब किसी भवन का निर्माण शुरू होता है तब उसकी नींव में रखे जाने वाले चार पत्थरों पर हल्दी-कुमकुम लगाया जाता है। मंत्र पढ़े जाते हैं। नारियल फोड़े जाते हैं। भूमि पूजन होता है। उस समय नींव के पत्थरों को लेकर इतनी श्रद्धा उमड़ती है मानो पूरा ब्रह्मांड उन्हीं के भरोसे टिका हो। लेकिन जैसे ही भवन खड़ा हो जाता है, समाज की नजर ऊपर उठ जाती है। फिर चर्चा केवल कंगूरों की होती है। रंग-रोगन की होती है। बालकनी की होती है। वातानुकूलित कमरों की होती है। नीचे दबे उन पत्थरों की चर्चा फिर कभी नहीं होती जिन्होंने अपना अस्तित्व मिटाकर पूरी इमारत को खड़ा किया।
राजनीति इससे भी अधिक निर्मम होती है। वह अपने नींव के पत्थरों को बहुत जल्दी भूल जाती है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में अजीत प्रमोद कुमार जोगी शायद ऐसे ही एक ‘नींव के पत्थर’ थे। 29 अप्रैल 1946 को एक साधारण आदिवासी अंचल में जन्मा वह बालक, जिसने आगे चलकर इंजीनियरिंग की, स्वर्णपदक प्राप्त किया, कॉलेज में अध्यापन किया, फिर आईपीएस बना, फिर आईएएस बना, संसद पहुंचा और अंततः 1 नवंबर 2000 को नवगठित छत्तीसगढ़ का प्रथम मुख्यमंत्री बना, वह कोई साधारण राजनीतिक जीव नहीं था। भारतीय राजनीति में मुख्यमंत्री तो अनेक बने। कई ऐसे भी बने जिनकी योग्यता का प्रमाणपत्र खोजने के लिए इतिहासकारों को माइक्रोस्कोप लगाना पड़ जाए। लोकतंत्र का सौंदर्य भी यही है और त्रासदी भी यही कि कभी-कभी आठवीं पास व्यक्ति भी मुख्यमंत्री बन जाता है कभी-कभी आईएएस छोड़कर राजनीति में आया असाधारण प्रतिभा वाला व्यक्ति जीवन भर अपनी जाति सिद्ध करता रह जाता है। दरअसल छत्तीसगढ़ निर्माण के समय परिस्थितियां अत्यंत विषम थीं। राज्य का बंटवारा केवल नक्शे पर लकीर खींच देने का मामला नहीं था। यह संसाधनों, प्रशासनिक ढांचे, संस्थानों, जल, जंगल, जमीन और भविष्य के बंटवारे का प्रश्न था। कहा जाता है कि उस समय राजनीतिक रूप से मध्यप्रदेश की स्थिति कहीं अधिक मजबूत थी। लेने वाला हमेशा कमजोर होता है, देने वाला हमेशा शर्तें तय करता है। फिर भी अजीत जोगी ने अपनी प्रशासनिक समझ, राजनीतिक कूटनीति और असाधारण स्मरण शक्ति के बल पर जितना संभव था उससे कहीं अधिक छत्तीसगढ़ के पक्ष में हासिल करने का प्रयास किया।
मुझे रायपुर का वह कार्यक्रम आज भी स्मरण है जिसमें वन विभाग द्वारा वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों के लिए मुझे सम्मानित किया जा रहा था। मंच पर अजीत जोगी उपस्थित थे। छत्तीसगढ़ राज्य बने कुछ ही महीने हुए थे।
मैंने अपने वक्तव्य में कहा था, राज्य निर्माण कोई रातों-रात होने वाली प्रक्रिया नहीं है। लेकिन अजीत जोगी की कार्यशैली देखकर ऐसा लगता है कि वे सदियों का काम दशकों में करना चाहते हैं। ‘सभा में हल्की मुस्कान फैल गई थी। लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि वह टिप्पणी केवल भाषण नहीं थी, एक ऐतिहासिक अवलोकन था। हम बस्तरिया से ज्यादा भला कौन जानता है कि उस दौर में परिवहन व्यवस्था कितनी जर्जर थी। सरकारी बसें स्वयं अपनी मृत्यु का इंतजार करती दिखाई देती थीं। बस्तर की यात्रा किसी दंड यात्रा से कम नहीं होती थी। ऐसे समय में रातों-रात निजी परिवहन व्यवस्था को प्रोत्साहित कर जिस प्रकार आवागमन को गति दी गई, उसने पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संपर्क को बदल दिया। इसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में निजी विश्वविद्यालयों को अनुमति देने का उनका निर्णय उस समय उपहास का विषय बना। विरोधियों ने कहा कि ‘डिग्री की दुकानें खुल जाएंगी।’ व्यंग्य किए गए। कार्टून बने। लेकिन आज पूरा देश उसी रास्ते पर चल रहा है। गुणवत्ता का प्रश्न अपनी जगह है, परंतु यह स्वीकार करना पड़ेगा कि जोगी समय से
पहले भविष्य को पढ़ लेने वाले व्यक्ति थे।
अजीत जोगी को लेकर खड़ा किया गया जातीय विवाद केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक क्षति नहीं थी। उससे कहीं अधिक नुकसान छत्तीसगढ़ की संभावनाओं का हुआ। उनकी ऊर्जा, जो राज्य निर्माण में लगनी चाहिए थी, उसका बड़ा हिस्सा स्वयं को सिद्ध करने में खर्च हो गया। वे अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घुसे जरूर, पर उससे कभी बाहर नहीं निकल पाए। उनकी एक और विशेषता थी, पुस्तकों के प्रति उनका जुनून।
किताबों को वे केवल पढ़ते नहीं थे, उन्हें जीते थे। पुस्तकों के प्रति हमारा अनुराग भी समान था, मेरी तो किताबों की प्रति दीवानगी रही है, और इससे वे परिचित भी थे। और संभवतः इसी कारण हमारे बीच वैचारिक संवाद हमेशा सहज रहा। उनकी पुस्तक ‘दृष्टिकोण’ संभवतः छत्तीसगढ़ निर्माण से पहले ही प्रकाशित हो चुकी थी, जिसमें उनके राजनीतिक और सामाजिक चिंतन की स्पष्ट झलक मिलती है।
29 मई 2020 को जब उनका निधन हुआ
तब केवल एक व्यक्ति नहीं गया, छत्तीसगढ़ के आरंभिक स्वप्नों का एक बड़ा अध्याय भी विदा हो गया। लेकिन विडंबना देखिए, जिस व्यक्ति ने पूरे जीवन छत्तीसगढ़ के लिए संघर्ष किया, उसके जाने के बाद भी राजनीति ने उसे चैन से नहीं छोड़ा। मृत्यु के बाद भी लोग उसकी जाति नापते जांचते रहे, उसकी नीयत तौलते रहे और उसके योगदान को कम करने में लगे रहे।
शायद इसलिए कि नींव के पत्थरों से लोग हमेशा असहज रहते हैं।
वे ऊपर दिखाई नहीं देते, लेकिन पूरी इमारत उन्हीं के भरोसे खड़ी रहती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि अजीत जोगी का मूल्यांकन कांग्रेस या भाजपा के चश्मे से नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के इतिहास के चश्मे से किया जाए। राजनीतिक पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर किया जाए। क्योंकि कोई भी समाज तब तक परिपक्व नहीं कहलाता जब तक वह अपने मौन शिल्पियों का सम्मान करना न सीख ले।
(लेखक कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ साभार )










