रायगढ़। सूरज की तपिश और शासन का कैलेंडर, इन दोनों के बीच इस समय रायगढ़ के विद्यार्थी पिस रहे हैं। 16 जून से स्कूल खुलने के बाद शहर की सड़कों पर रोज ऐसी तस्वीरें दिखाई दे रही हैं, जो बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। नर्सरी और प्री-प्राइमरी के वे नन्हे-मुन्ने बच्चे, जो अभी अपना बस्ता भी ठीक से नहीं संभाल पाते, से लेकर 12वीं कक्षा तक के विद्यार्थी भीषण गर्मी और उमस के बीच स्कूल पहुंच रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक दफ्तरों में तैयार किए गए शैक्षणिक कैलेंडर में उन वास्तविक परिस्थितियों का पर्याप्त आकलन किया गया, जिनका सामना इस समय हजारों बच्चे रोजाना कर रहे हैं।
हमारी टीम ने सुबह 7 बजे से दोपहर 1 बजे तक शहर के विभिन्न निजी और सरकारी स्कूलों के बाहर हालात का जायजा लिया। सुबह अपेक्षाकृत राहत भरा मौसम 10 बजे के बाद तेजी से बदला और दोपहर होते-होते तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के बीच पहुंच गया। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्कूल खुलने के शुरुआती दिनों में ही शहर के अस्पतालों में हीटस्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, तेज बुखार, उल्टी और उमस से जुड़ी समस्याओं से पीड़ित स्कूली बच्चे उपचार के लिए पहुंचने लगे हैं
बढ़ते तापमान और लगातार बनी हुई उमस के बीच अभिभावकों की चिंता भी गहराने लगी है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या मौजूदा मौसम परिस्थितियों में विद्यार्थियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देते हुए स्कूल संचालन और अवकाश व्यवस्था पर पुनर्विचार की आवश्यकता है? यह ग्राउंड रिपोर्ट उन्हीं जमीनी हकीकतों को सामने लाने का प्रयास है, जिनके बीच हजारों बच्चे नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत कर रहे हैं।
क्लासरूम के ‘दमघोंटू’ माहौल में संघर्ष कर रहे बच्चे
स्कूल परिसरों के भीतर का हाल भी बाहर की तपती सड़कों से बहुत अलग नहीं है। विडंबना यह है कि जहां निजी स्कूल अभिभावकों से मोटी फीस वसूलते हैं, वहीं गर्मी से राहत के नाम पर बच्चों के हिस्से अक्सर सिर्फ सीलिंग फैन ही आते हैं। सरकारी स्कूलों की स्थिति भी कई जगह चिंता बढ़ाने वाली है, जहां बुनियादी सुविधाओं को लेकर चुनौतियां साफ दिखाई देती हैं। रही-सही कसर बार-बार होने वाली बिजली कटौती पूरी कर देती है। कई स्कूलों में पर्याप्त पावर बैकअप की व्यवस्था नहीं होने के कारण बिजली जाते ही कक्षाएं उमस और गर्मी से भर जाती हैं। ऐसे में बच्चे पसीने से तर-बतर होकर पढ़ाई करने को मजबूर हो जाते हैं और क्लासरूम का माहौल किसी परीक्षा से कम नहीं लगता।
पेयजल व्यवस्था भी कम चिंताजनक नहीं है। घर से लाई गई पानी की बोतलें खाली होने के बाद बच्चों को स्कूल परिसर में उपलब्ध साधारण नलों के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। भीषण गर्मी के इस दौर में ठंडे और शुद्ध पेयजल की पर्याप्त व्यवस्था का अभाव बच्चों की परेशानी को और बढ़ा देता है। दोपहर की तपिश में टंकियों का पानी गर्म हो जाना और बच्चों का उसी से प्यास बुझाना आम दृश्य बन गया है। बढ़ती गर्मी और उमस के बीच ऐसे हालात अभिभावकों की चिंता को भी बढ़ा रहे हैं।
क्लासरूम के भीतर का वातावरण इतना असहज हो जाता है कि कई बच्चों का ध्यान पढ़ाई से ज्यादा गर्मी से राहत पाने पर केंद्रित नजर आता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब मौसम लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, तब क्या स्कूलों में बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम वास्तव में मौजूद हैं? आखिर शिक्षा का माहौल ऐसा होना चाहिए, जहां बच्चे सीखने पर ध्यान दें, न कि गर्मी और प्यास से जूझने पर।
छुट्टी के बाद सड़कों पर ‘अग्निपरीक्षा’ का नजारा
स्कूल परिसर के बाहर का दृश्य भी कम विचलित करने वाला नहीं है। सुबह 10:30 बजे जब नर्सरी और प्राथमिक कक्षाओं की छुट्टी होती है, तब तक सूरज अपने तीखे तेवर दिखाना शुरू कर देता है। तपती सड़कों पर वाहनों का इंतजार करते इन मासूमों के चेहरों पर गर्मी और थकान साफ पढ़ी जा सकती है। कोई बच्चा पानी की बोतल से बार-बार गला तर करता नजर आता है, तो कोई पसीने से तर-बतर होकर छांव तलाशता है। अपने वजन से भारी स्कूल बैग लादे इन नन्हे-मुन्ने बच्चों की स्थिति देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह मौसम उनके लिए कितनी बड़ी ‘अग्निपरीक्षा’ साबित हो रहा है।
वहीं, दोपहर 12 से 1 बजे के बीच जब बड़ी कक्षाओं की छुट्टी होती है, तब तक तापमान अपने चरम पर पहुंच चुका होता है। करीब 40 डिग्री की इस झुलसाती धूप में विद्यार्थी सिर पर तौलिया बांधे, छाते का सहारा लिए या चेहरे को कपड़े से ढककर घर लौटते दिखाई देते हैं। स्कूल गेट पर खड़े अभिभावकों के चेहरों पर भी बच्चों को सुरक्षित घर ले जाने की चिंता साफ झलकती है। परिवहन की स्थिति तो हालात को और भी बदतर बना रही है। तेज धूप में तप चुके स्कूल बस, ऑटो और वैन किसी ‘लोहे के गर्म डिब्बे’ में तब्दील हो जाते हैं। कई ऑटो और वैन में क्षमता से कहीं अधिक बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंसकर ले जाते हुए देखा गया। भीषण गर्मी और उमस के बीच, एक-दूसरे से सटकर सफर करने को मजबूर इन बच्चों की यह स्थिति न केवल अमानवीय है, बल्कि यातायात नियमों और बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
क्या कहते हैं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. ताराचंद पटेल
सड़कों से लेकर क्लासरूम तक महसूस की जा रही भीषण गर्मी और उमस का असर अब अस्पतालों की ओपीडी में भी दिखाई देने लगा है। शहर के कान्हा हॉस्पिटल के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. ताराचंद पटेल के अनुसार पिछले कुछ दिनों में तेज बुखार, डिहाइड्रेशन, अत्यधिक कमजोरी और उल्टी की शिकायत लेकर आने वाले बच्चों की संख्या बढ़ी है। उनका कहना है कि कई बच्चों का शरीर अचानक बदलते तापमान और अत्यधिक उमस के प्रभाव को सहन नहीं कर पा रहा है। डॉ. पटेल बताते हैं कि उनके पास लगातार ऐसे बच्चे पहुंच रहे हैं जिन्हें 103 से 104 डिग्री तक बुखार, लगातार उल्टियां और अत्यधिक सुस्ती जैसी समस्याएं हैं।
हाल ही में एक बच्चे की स्कूल में ही तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद उसे सीधे अस्पताल लाना पड़ा। उनके मुताबिक घरों के अपेक्षाकृत ठंडे वातावरण से निकलकर गर्म और उमस भरे माहौल में लंबे समय तक रहने से बच्चों में हीटस्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और अन्य मौसमी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताते हुए डॉ. पटेल ने शासन को सुझाव दिया है कि मौसम सामान्य होने तक छुट्टियां बढ़ाने पर विचार किया जाना चाहिए। यदि यह संभव न हो, तो कोविड काल की तर्ज पर ऑनलाइन कक्षाओं की वैकल्पिक व्यवस्था लागू की जा सकती है। उनका कहना है कि पढ़ाई की भरपाई बाद में की जा सकती है, लेकिन बच्चों के स्वास्थ्य से किसी प्रकार का समझौता उचित नहीं होगा।
क्या कहते हैं डीईओ
पूरे मामले पर जिला शिक्षा अधिकारी श्यामानंद साहू ने कहा कि भीषण गर्मी को देखते हुए शासन ने अप्रैल माह में ही ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित किया था। अब 16 जून से स्कूल खोलने का निर्णय भी शासन स्तर पर लिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अवकाश बढ़ाने अथवा शैक्षणिक कैलेंडर में किसी प्रकार का संशोधन करने का अधिकार शासन के पास ही है। स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की कमी संबंधी शिकायतों पर डीईओ ने बताया कि स्कूल प्रबंधनों की बैठक लेकर पहले ही आवश्यक निर्देश जारी किए जा चुके हैं। उन्हें निर्बाध बिजली, स्वच्छ पेयजल और विद्यार्थियों के बैठने की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है। यदि किसी स्कूल में इन निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है और विद्यार्थियों को असुविधा हो रही है, तो शिक्षा विभाग द्वारा निरीक्षण कर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।










